अन्य से अनन्या' हिंदी की सुपरिचित समकालीन लेखिका प्रभा खेतान की आत्मकथा है। भोगे हुए यथार्थ के जीवंत दस्तावेज के रूप में दर्ज यह उपन्यास पाठकों के मध्य जितना प्रचलित है, उतना ही विवादित भी है । प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा के माध्यम से अपने जीवन के कष्टमय क्षणों को पूरी संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है। लेखिका ने अपने आत्मसंघर्ष और समाज तथा परिवार के साथ अपनी कठिन परिस्थितियों के भीतर लड़कर राह तलाशने की वेदना भरी यात्रा को प्रकट करने का साहसिक कार्य किया है। स्त्री के जीवन को मर्यादा की सामाजिक तराजू से तोलने वाले मापदंडो को तोड़कर, यह रचना अपने समय से आगे निकल कर नारी मुक्ति की नई परिभाषा को गढ़ने का प्रयास है। 'अन्य से अनन्या' का सबसे विशिष्ट पक्ष है लेखिका का प्रेमप्रसंग जिसमें उन्होंने अपने हृदय को परत दर परत खोल कर प्रेम के मूल्य को सामाजिक रूढ़ि को तोड़ते हुए स्थापित करने का प्रयास किया है। वह एक विवाहित तथा अपने से अठारह वर्ष बड़े व्यक्ति से प्रेम करती है । यह प्रेम जहां एक ओर उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है, वहीं दूसरी ओर उनके अस्तित्व पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न भी। अपने प्रेम की वजह से वह कदम-कदम पर समाज द्वारा घेरी जाती है और अनेकों उलाहनों की पीड़ा सहते हुए भी अपनी अस्मिता की रक्षा करती है। वह आत्मनिर्भर है और तमाम यातनाओं को सहते हुए भी झुकने के लिए तैयार नही है। वह सामाजिक मान्यताओं के बने-बनाये ढांचे के भीतर बंधे रहकर, अपनी जीवन की अभिलाषाओं को कुचल कर जीने से इनकार करती है ।
बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...
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