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 "न दिन होता है अब न रात होती है

सभी कुछ रुक गया है

वो क्या मौसम का झौंका था
जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर
तिरछी कर गया है"



आज बात एक ऐसी फिल्म की जो न केवल मध्यवर्गीय जीवन की पीड़ा को रेखांकित कर उसके अंतर्द्वंद्व को उघार देती है, बल्कि उसके भीतर के उस महान हृदय को भी स्पर्श करती है जो अपनी लघुता में भी त्याग को, अभाव में भी समर्पण को और असफलता में भी प्रेम को अपनी सबसे बड़ी निधि समझता हैं।

"रेनकोट" एक असफल प्रेम के साथ - साथ एक निष्फल जीवन की भी घुटन भरी मार्मिक गाथा है।


मनोज, जो जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर हारने के बाद अपने आत्मसम्मान की लाश को कन्धे पर लाद कर अपने पुराने मित्रों के आगे हाथ फैला कर मदद माँगने को भागलपुर से कलकत्ता के लिए निकल पड़ा है ताकि अपनी बहन की शादी के लिए पैसे जुटा सके। कलकत्ता में वह अपने हितैषी और मित्र आलोक के घर पर रुक कर अत्यंत संकोच के साथ आगे की योजना बनाता है और बाथरूम में शेव करते हुए अपने हालात पर टूटकर रो पड़ता है। इन कातर सिसकियों की आहट सुनाई देती है आलोक की पत्नी शीला को।


शीला, जो सबकुछ होने के बावजूद उस एक अभाव के सूनेपन में सिमटी हुई है जिसके बारे अब सोचना भी उसके वैवाहिक जीवन की वर्जनाओं के खिलाफ है। मनोज का दर्द उसे काफी जाना-पहचाना सा लगता है। वह जानती है अपनी नियति से समझौता करने का दुःख कितना गहरा होता है।

मनोज अपने कुछ मित्रों से मिलकर थोड़े बहुत पैसे इकट्ठा कर लेता है और फिर तेज बारिश में भीगते हुए वह दस्तक देता है नीरू के दरवाजे पर।

नीरू, जो कभी मनोज के लिए सबकुछ थी। लेकिन आज वह केवल एक परिचित है। कितनी कोशिश की थी मनोज ने नीरू को पाने के लिए लेकिन नीरू की अभिलाषाओं और अपनी बदकिस्मती के कारण उसने नीरू को हमेशा के लिए खो दिया।


कई बार दरवाजा खटखटाने और आवाज देने के बाद नीरू आखिरकार दरवाजा खोलती है और वर्षों बाद मन्नू को अपने सामने पाती है। बिजली चली गई है, नीरू मोमबत्ती जला कर कमरे को एक मद्धम प्रकाश से भर देती है। बारिश के थपेड़ों का शोर और गहरा जाता है-
"हाय कितने बरस बीतेsss तुम घर ना आये रेsss"


अतीत में दबे जख्मों पर झूठे किस्सों का मलहम लगा कर एक दूसरे के सामने अपनी जिंदगी को सार्थक साबित करने का मार्मिक सिलसिला प्रारम्भ होता है। अंधेरे कमरे में खोखले शब्दों से छलने वाली प्रवंचना आत्मा को बोझिल करती सी जान पड़ती है।


थोड़ी शाम गहरा जाती है, बारिश अब भी तेज है, नीरू मन्नू के लिए कुछ खाने का प्रबंध करने के लिए उसके रेनकोट को पहनकर बाहर जाती है, क्योंकि उसके सारे नौकर छुट्टी पर हैं। तभी एक नवागत का प्रवेश होता है...
इस नए मेहमान के द्वारा किये जाने वाला रहस्योद्घाटन मनोज को भीतर तक सन्नाटे से भर देता है।


मेहमान विदा लेता है और नीरू लौट आती है। मन्नू एक गहरी नजर से नीरू को निहारता है, मानो वह उसे पहचान नही पा रहा है। काश! वह नीरू को इस आत्मपीड़न के पिंजरे की कैद से आजाद कर पाता। काशsss !
लेकिन नीरू अपनी महत्वकांक्षाओं के उजड़े खंडहर में एक उदास रूह की तरह कैद है। एक ऐसा खंडहर जिसमें अब आशाओं और उम्मीदों को प्रवेश करने की इजाजत नही है। पार्श्व में संगीत गूंजता है-
"न दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झौंका था
जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर
तिरछी कर गया है"

किन्तु यह अंत नही है। अपनी तमाम दुश्वारियों के होते हुए भी ये दोनो अपने स्नेह की उस पवित्र समिधा का सम्मान रखने के लिए स्वयं को होम कर देते है जो अब भी उनके ह्रदय के किसी कोने में प्रज्वलितहै।

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