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पचपन खंभे लाल दीवारें (उषा प्रियंवदा)

‘पचपन खंभे लाल दीवारें', हिंदी साहित्य में नवलेखन के दौर की बहुचर्चित लेखिका उषा प्रियम्वदा का प्रथम उपन्यास है। उपन्यास की मुख्य चरित्र 'सुषमा' एक मध्यवर्गीय परिवार की अविवाहित युवती है। वह अपने घर की नाजुक आर्थिक परिस्थितियों की वजह से घर से दूर हॉस्टल में रहते हुए कॉलेज की नौकरी कर रही है। सुषमा अपने परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए, यौवनावस्था का अतिक्रमण कर कब तैंतीस वर्ष की हो जाती है उसे स्वयं भी पता नहीं चल पाता है। सुषमा अकेली है, वह अपना अकेलापन बांटने के लिए एक जीवन साथी के साहचर्य की आकांक्षा को मन ही मन साकार करने के स्वप्न देखती है। लेकिन अपने दायित्वों के बोझ तले वह इतना दबी है कि विवाह के बारे में सोचने में भी वह एक तरह का अपराधबोध महसूस करती है।
 सुषमा अपने से कम उम्र के नील से प्रेम करती है। नील उसे पसंद करता है, उसकी देखभाल करता है और हर दृष्टि से उसके जीवन मे व्याप्त सूनेपन को दूर करने में उसका हमसफर बन सकता है लेकिन, सुषमा सामाजिक मर्यादाओं के उल्लंघन और भाई-बहन के भविष्य की चिंता के दुष्चक्र में इतने गहरे धंस चुकी है कि उसे जीवन मे अपने निज के प्रति कोई आशा दिखाई नहीं पड़ती है। वह एक रिक्तता से भरे, भविष्य की संभावनाओं से शून्य जीवन की त्रासदी बन अपने आप मे सिमट कर रह जाती हैं।
 लेखिका ने सुषमा के माध्यम से आधुनिक समय की गंभीर समस्याओं को उठाया है। सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां किस तरह आज के मध्यवर्गीय व्यक्ति (विशेष कर नारी) के जीवन को नियंत्रित कर उसके वर्तमान को एक घुटन, एक संत्रास, एक कुंठा में बदल कर जीने पर मजबूर करती है।

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