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चाक (मैत्रेयी पुष्पा)

'चाक' मैत्रयी पुष्पा द्वारा रचित अद्वितीय उपन्यास है जो कि ग्रामीण पृष्ठभूमि में अत्यंत सशक्त रूप में स्त्री अस्मिता के स्तर को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। 'चाक' की 'रेशम' विवाह संस्था के बाहर भी गर्भधारण का अधिकार चाहती है और 'सारंग'  पति , पुत्र , सास-ससुर से भरे-पूरे परिवार में होते हुए भी प्रेम करने का अधिकार चाहती है। ये औरतें उस जटिल ग्रामीण परिवेश में अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों की पुरजोर वकालत करतीं है, जहां का समाज नारी-जाति की परंपरागत और रूढ़ धारणाओं पर टिका है। रेशम अपने जेठ के द्वारा मौत के घाट उतार दी जाती है, जैसा कि इस गांव में स्त्रियों के साथ होता आया था, लेकिन सारंग इस अपराध का मुखर विरोध करती है और रेशम को न्याय दिलवाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा देती है। सारंग इस उपन्यास की मुख्य पात्र है जो गांव में रहकर भी आधुनिक स्त्री की प्रतिनिधि है। वह पति के शुष्कता भरे स्वभाव से विरक्त होकर यदि अन्य पुरूष के साथ संबंध बनाती है तो उसे कोई पाप नही समझती है। सारंग में यदि स्त्रियोचित कोमलता है तो उसमें निडरता भी है। वह एक ओर न्योछावर होकर प्रेम करना जानती है तो दूसरी ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने अधिकारों के लिए लड़ने का हौसला भी रखती है।
सारंग पूरी मानवता की पक्षधर बन कर उभरती है और गांव के लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का बीड़ा उठाती है।
उपन्यास में कई ऐसे प्रसंग है जो स्त्रियों के प्रति समाज की दोहरी मानसिकता के परतों को उघाड़ते हुए, नारी द्वारा पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देने का वास्तविक चित्रण हमारे सामने लाते हैं।

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