Skip to main content

कायाकल्प (मुंशी प्रेमचंद)

कायाकल्प' मुंशी प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने मुख्य रूप से साम्प्रदायिकता की समस्या को उठाया है। उपन्यास में दोनों धर्मों के कुछ अवसरवादी तत्वों के द्वारा दंगो की आड़ में अपने स्वार्थ को साधने का यथार्थ चित्रण किया गया है। इस कहानी का मुख्य पात्र 'चक्रधर' है जिसमें समाजसेवा की प्रबल भावना है। चक्रधर जमींदार की पुत्री मनोरमा से प्रेम करता है लेकिन उनका विवाह नही हो पता है। बाद में वह सारी परम्पराओं को ठुकराकर एक मुस्लिम परिवार की विधवा से शादी करता है।
उपन्यास के कथानक के समानांतर एक पुनर्जन्म की कहानी भी चल रही है। जगदीशपुर की विलासप्रिय रानी देवप्रिया को जब अपने पूर्वजन्म का पति मिल जाता है तब वह अपनी जागीर विशाल सिंह को सौंप कर चली जाती है।
प्रेमचंद ने कायाकल्प में अलौकिकता का सृजन कर उसे सामयिक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया है। उपन्यास में जागीरदारों द्वारा चमारों के शोषण, कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार और अंग्रेजी हुकूमत के हिंसक स्वरूप का वर्णन किया गया है। मूल संवेदना में चक्रधर का जीवन संघर्ष है जो पाठकों को प्रभावित किये बिना नहीं छोड़ता है।

Comments

Popular posts from this blog

पिता की याद में

बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...
  "न दिन होता है अब न रात होती है सभी कुछ रुक गया है वो क्या मौसम का झौंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है" आज बात एक ऐसी फिल्म की जो न केवल मध्यवर्गीय जीवन की पीड़ा को रेखांकित कर उसके अंतर्द्वंद्व को उघार देती है, बल्कि उसके भीतर के उस महान हृदय को भी स्पर्श करती है जो अपनी लघुता में भी त्याग को, अभाव में भी समर्पण को और असफलता में भी प्रेम को अपनी सबसे बड़ी निधि समझता हैं। "रेनकोट" एक असफल प्रेम के साथ - साथ एक निष्फल जीवन की भी घुटन भरी मार्मिक गाथा है। मनोज, जो जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर हारने के बाद अपने आत्मसम्मान की लाश को कन्धे पर लाद कर अपने पुराने मित्रों के आगे हाथ फैला कर मदद माँगने को भागलपुर से कलकत्ता के लिए निकल पड़ा है ताकि अपनी बहन की शादी के लिए पैसे जुटा सके। कलकत्ता में वह अपने हितैषी और मित्र आलोक के घर पर रुक कर अत्यंत संकोच के साथ आगे की योजना बनाता है और बाथरूम में शेव करते हुए अपने हालात पर टूटकर रो पड़ता है। इन कातर सिसकियों की आहट सुनाई देती है आलोक की पत्नी शीला को। शीला, जो सबकुछ होने के बावजूद उस एक अभाव के सूनेपन में...

मानस प्रसंग (4)

हम रामचरितमानस को धार्मिक दृष्टि से देखने के पक्षपाती हैं इसीलिए इस महाकाव्य के उन असाधारण प्रसंगों का मूल्यांकन नही किया जाता है जो अपनी अंतर्वस्तु में लौकिक और मार्मिकता से संपृक्त हैं। जैसे, तुलसीदास जी ने वाल्मीकि रामायण से आगे बढ़कर मानस में जनक वाटिका के राम-सीता मिलन के प्रसंग का सृजन कर स्वयंवर को शक्तिपरीक्षण के स्थान पर प्रेम-विवाह के मंच के रूप में स्थापित किया। अतः मानस को केवल भक्तिकाव्य के रूप में देखे जाने से उसके बहुत सारे पक्ष गौण हो जाते हैं जो मानवीय दृष्टि से हमारे लिए प्रतिमान हैं, जिसमे एकनिष्ठ प्रेम के आदर्श हैं, अपने जीवनसाथी से बिछुड़ने की पीड़ा है, उसके लिए किसी भी सीमा को लांघ जाने का साहस है। तुलसीदासजी ने मानस रचना की प्रक्रिया में अपने काल का अतिक्रमण कर ऐसी प्रगतिशील समन्वयवादी दृष्टि को साधा जिसके कारण किसी भी विचारधारा के आलोचक उन्हें ख़ारिज करने का साहस नही कर सके। आज के मानस प्रसंग की कड़ी में लंकाकाण्ड के पृष्ठों से उद्घाटित सीता-त्रिजटा संवाद का यह अंश भी ऐसा ही अद्भुत कोटि का प्रसंग है जिसे पहली बार पढ़कर आप भी आश्चर्यचकित हो उठेंगे।  लंक...