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छिन्नमस्ता (प्रभा खेतान)

छिन्नमस्ता, भारतीय समाज में स्त्री की वैयक्तिकता के दमन को पूरी नग्नता के साथ उभारने वाला जीवंत दस्तावेज है। लेखिका प्रभा खेतान ने इस उपन्यास में मारवाड़ी समाज और केंद्रीय पात्र 'प्रिया' के जीवन को आधार बना कर, नारी जाति के कोमल पक्षों को निर्ममता के साथ कुचले जाने का यथार्थ चित्रण किया है। प्रिया अपने परिवार की अनचाही संतान है जो तिरस्कार और शुष्कता के वातावरण में बड़ी हुई है और अपने घर में ही बालात्कार जैसी भयानक त्रासदी झेल चुकी है। परिपक्व होने से पहले ही उसका व्यक्तित्व शून्यता से भर गया है। उसका विवाह दूसरी पत्नी के रूप में नरेंद्र से कर दी जाती है जो पितृसत्तात्मक मानसिकता का ही विद्रूप चेहरा है। नरेंद्र स्त्री को संपत्ति और भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ नही समझता है। इस प्रकार प्रिया ससुराल में भी निरंतर प्रताड़ना का शिकार होती है। प्रिया समस्त यातनाओं को भोगते हुए भी अपने अस्तित्व को बिखरने से रोकना चाहती है। अपने स्व को बचाने के लिए तथा अपनी पहचान को गढ़ने के लिए वह संघर्ष करती है और सामना करती है उस रूढ़िगत मानसकिता का, जो औरत को मनुष्य तक मानने के लिए तैयार नही है। लेखिका ने माता छिन्नमस्तिका के प्रतीक के द्वारा, प्रिया के आत्मसंघर्ष और नारी मुक्ति की स्थापना का प्रयत्न किया है। यह उपन्यास स्त्री के प्रति पुरुषवादी सोच और पितृसत्तात्मक शोषण के ढांचे का यथार्थ चित्रण करते हुए बहुविवाह जैसे सामाजिक कुरीतियों और सभ्य समाजों में पर्दों के भीतर नारी के साथ होने वाले अत्याचारों का एक ऐसा स्तावेज है जो हमे सोचने पर मजबूर कर देता है।

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पिता की याद में

बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...
  "न दिन होता है अब न रात होती है सभी कुछ रुक गया है वो क्या मौसम का झौंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है" आज बात एक ऐसी फिल्म की जो न केवल मध्यवर्गीय जीवन की पीड़ा को रेखांकित कर उसके अंतर्द्वंद्व को उघार देती है, बल्कि उसके भीतर के उस महान हृदय को भी स्पर्श करती है जो अपनी लघुता में भी त्याग को, अभाव में भी समर्पण को और असफलता में भी प्रेम को अपनी सबसे बड़ी निधि समझता हैं। "रेनकोट" एक असफल प्रेम के साथ - साथ एक निष्फल जीवन की भी घुटन भरी मार्मिक गाथा है। मनोज, जो जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर हारने के बाद अपने आत्मसम्मान की लाश को कन्धे पर लाद कर अपने पुराने मित्रों के आगे हाथ फैला कर मदद माँगने को भागलपुर से कलकत्ता के लिए निकल पड़ा है ताकि अपनी बहन की शादी के लिए पैसे जुटा सके। कलकत्ता में वह अपने हितैषी और मित्र आलोक के घर पर रुक कर अत्यंत संकोच के साथ आगे की योजना बनाता है और बाथरूम में शेव करते हुए अपने हालात पर टूटकर रो पड़ता है। इन कातर सिसकियों की आहट सुनाई देती है आलोक की पत्नी शीला को। शीला, जो सबकुछ होने के बावजूद उस एक अभाव के सूनेपन में...

पूर्णेन्दु के जन्मदिवस पर

राजनगर की तबाही से राग दरबारी तक। बीएससी साइकल से  सरकारी गाड़ी तक।। एरिटोप जेल से  पतंजलि एलोवेरा तक। अंतहीन बातों में गुजरे रात से सवेरा तक।। बिन बुलाई शादियों में घुस कर दावत खाने तक। जोड़-जोड़ कर चार पैसे कॉण्ट्रा खेलने जाने तक।। ग्राफिक्स वर्ल्ड के स्लो इंटरनेट में लोड होते पेज तक। बेफिक्री वाले बचपने से संघर्षों वाले ऐज तक।। हँसी के ठहाकों में दबी  बेचैनी की आहों तक। चिंता के बादल में डूबी नम होती निगाहों तक।।   गिरते-संभलते ठोकर खाते मंजिल को पाने तक। बीते हुए कल से लेकर आने वाले जमाने तक।। ~ जन्मदिन मुबारक रहेगा ~