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गुड़िया भीतर गुड़िया (मैत्रेयी पुष्पा)

मैत्रेयी पुष्पा की 'गुड़िया भीतर गुड़िया' आत्मकथात्मक उपन्यासों को लिखने के समकालीन प्रयासों में एक बेबाक और साहसिक प्रविष्टि है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखिका ने अपने जीवन के निजी क्षणों की गांठो को खोलकर, अपने भोगे हुए सच को शब्दों में उतारने का दृढ़ प्रयास किया है। गुड़िया भीतर गुड़िया की मैत्रेयी अपने स्त्री होने के की सभी जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए बार-बार ठगी जाती है। कभी बेटियों को जन्म देने की उलाहने सहती है तो कभी पति की संदेहास्पद वचनों से आहत होती है। नारी को केवल उपभोग की वस्तु समझने वाले समाज की वास्तविकता उसके मन को रिक्तता से भर देती हैं।
वह पुरुषवादी अहंकार और स्त्री की परंपरागत दासता के स्थापित प्रतिमान को चुनौती देती है, अपने निज के समर्पण से इनकार करती है और नारी के प्रति गढ़े हुए रूढ़िगत धारणाओं पर प्रश्न उठाती है।
उसने नारी के सामाजिक और नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए जीवन मे बहुत कुछ खोया है। अब वह अपने व्यक्तित्व पर किसी का नियंत्रण नहीं चाहती है। वह नारी की स्वतंत्रता को बांधने के लिए विवाह जैसी व्यवस्था को खोखला मानती है और बलात अपने व्यक्तित्व को गृहस्थी की परिपाटी में बिखरने देने को तैयार नही हैं। यह उपन्यास, अपनी जीवटता और सामर्थ्य के बल पर एक अत्यंत साधारण महिला के द्वारा, विषम परिस्थितियों के बावजूद, जीवन में ऊंचा मुकाम हासिल करने की जिजीविषा से भरा हुआ है।
उपन्यास में ग्रामीण और शहरी जीवन के द्वंद के सजीव चित्रण के साथ ही सामाजिक और राजनीतिक सरोकार भी उपस्थित है। 

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बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...

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