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एक ज़मीन अपनी (चित्रा मुद्गल)

एक ज़मीन अपनी स्त्री विमर्श साहित्य में चित्रा मुद्गल द्वारा लिखा गया एक नये तेवर का उपन्यास है। कथावस्तु, बड़े शहरों की चकाचौंध करती दुनिया में अपने वजूद को तलाशती एक मध्यवर्गीय युवती 'अंकिता' के बारे में है । अंकिता विज्ञापन के क्षेत्र में कार्य करने वाली, एक साधारण परिवार की लड़की है जो घर की आर्थिक बदहाली दूर करने और स्थायी नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रही है। अंकिता को अपनी योग्यता के बावजूद, बार-बार उसके स्त्री मात्र होने के कारण उससे समझौता की अपेक्षा की जाती है।
अंकिता भावुक है किन्तु वह कमजोर नही है। वह महानगरीय बाजारवाद की बुराइयों से खुद को दूर रख, अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। वह समझौते के लिए तैयार नही होती है, जिसके कारण उसे तरह-तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ती है।
उपन्यास में शहरों के उपभोक्तावादी चरित्र, विज्ञापनों के मायावी संसार और स्त्री के प्रति असमान व्यवहार को प्रस्तुत कर बड़े शहरों के खोखलेपन को प्रभावी ढंग से उजागर किया गया है। उपन्यास का एक दूसरा पक्ष नारी-पुरूष संबंधों में तनाव का रेखांकन है। लेखिका, अंकिता के माध्यम से नारी मुक्ति के नए आयामों को कथानक में स्थान देती हैं, जिसमें महिलाएँ स्वतन्त्र और आत्मनिर्भर हैं तथा चुनाव करने में सक्षम हैं।

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पिता की याद में

बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...
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मानस प्रसंग (4)

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