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आपका बंटी (मन्नू भंडारी)

आपका बंटी' मन्नू भंडारी का सबसे लोकप्रिय उपन्यास है। इस उपन्यास में लेखिका ने दाम्पत्य जीवन में तलाक की त्रासदी और शिशु 'बंटी' के बाल मनोविज्ञान पर उसके प्रभाव का ऐसा वास्तविक चित्रण किया है जिसे पढ़कर पाठक स्तब्ध रह जाते हैं। पति-पत्नी में संबंध-विच्छेद और जीवन में नई संभावनाओं को तलाशने के प्रयास, आधुनिक भारतीय समाज में अब कोई नई घटना नही है। लेकिन जब तलाकशुदा मां-बाप के बीच एक अबोध संतान उपस्थित हो, तब यह घटना कितनी चुनौतीपूर्ण और संवेदनशील बन जाती है इसका जीवंत उदाहरण है यह उपन्यास।
उपन्यास की मूल संवेदना बंटी की पीड़ा है जिसका बचपन न चाहते हुए भी माता-पिता के तनावपूर्ण रिश्तों की आँच से झुलस रहा है। वह अनिश्चितता से घिरे वातावरण में ऐसी यातनाओं से गुजरता है जिसका वह अधिकारी नही है। मन्नू भंडारी ने इस सामयिक यथार्थ का अत्यंत सूक्ष्मता के साथ अंकन कर बाल मनोविज्ञान की गहराई को नापने का अद्भुत प्रयास किया है। उन्होंने पति-पत्नी के रिश्तों में बिखराव और संबंध-हीनता की पड़ताल करते हुए, नए सम्बन्धों की मांग में छिपे अर्थबोध को बारीकी के साथ उजागर किया है। तलाक की समस्या और उसमें उलझे बाल मन की मनःस्थिति के सबसे प्रबल उदाहरण के रूप में दर्ज यह उपन्यास निश्चित ही भारतीय साहित्य की अनुपम कृतियों में से एक है।

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बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...

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