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लौट चलो



सुनो अवनी की उन 
कातर चीत्कारों को,
जो मांग रही हमसे क्षमा
अपने नैसर्गिक प्रेम को
बांटने के अपराध में।
सुनो विलाप करती हुई उस
धरती का लोमहर्षक रुदन,
जो दे रही हमे चेतावनी।
मनुष्य! रोक दो अपनी
क्षुधातुर एषणा के रथ को
अन्यथा सूख जाएंगे
सरिता के स्त्रोत
और बुझ जाएगी प्यास 
सदा के लिए।
मिट जाएगा हवा और 
जहर का भेद।
फूल से कुम्हला जाएंगे 
बच्चों के फेफड़ें।
जीवन गर्भ में आते ही 
दम तोड़ देगा।
मर जाएंगे पर्वत, 
सड़ जाएगा समुद्र और
मिटा देगा दावानल 
जंगलों को सदा के लिए।
मढ़ा जाएगा असंख्य जीवहत्या 
का पाप तुम्हारे सर और 
मुक्त नही होगा मनुष्य इस 
महापातक से कल्पों तक।
पिघला दो सभी गाड़ियों का लोहा
और भर दो ज्वालामुखी की दरारों में।
इकट्ठा करके प्लास्टिक के पहाड़
चुनवा दो उसे पत्थर की दीवार से।
झोंक दो वे सारे उपकरण,
जो तुम्हें देते हैं आनंद 
सुलगती हुई धरती की कीमत पर।
बंद कर दो फैक्ट्रीयां और
उनमें बनने वाले रसायन,
इस हलाहल को नदियां 
अब और नही पी सकतीं।
गिरा डालो इन अट्टालिकाओं को 
और लौट चलों उन्हीं विवरों में 
जहां से प्रारंभ हुआ था
यह मन्मथ पागलपन।
लौट चलो क्योंकि
तुम्हारी अभीप्सा का बोझ
यह धरती अब और नही सह सकती।

सुयश मिश्र 'सजल'

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