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कलगी बाजरे की : अज्ञेय


अज्ञेय उन थोड़े से साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने अपने सृजनात्मकता का प्रयोग कर एक नए युग का सूत्रपात किया। उन्होंने बने-बनाये रास्तों पर चलने के स्थान पर अपनी राह स्वयं चुनी और परम्पराओं से बहुत कुछ लिया तो बहुत कुछ जोड़ा भी। उन्होंने जिस भी विधा को स्पर्श किया, चाहे वह कविता हो, निबंध हो या उपन्यास, उसमे मौलिकता का सृजन किया और बिल्कुल नए प्रतिमान स्थापित किये। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी अज्ञेय ने जब कविता में प्रेम को अभिव्यक्त किया तब "कलगी बाजरे की" जैसी असाधारण रचना सामने आई ।
अज्ञेय ने जड़ हो चुके उपमानों के प्रति विद्रोह छेड़ दिया था और उनकी कविता "कलगी बाजरे की" तो प्रयोगवाद की बदली हुई काव्यदृष्टि का घोषणा पत्र है।
आज उनके जन्मदिन के अवसर पर #मसि_कागद पर इसी कविता की प्रस्तुति एक सरल व्याख्या के साथ...

अगर मैं तुम को ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका
अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुंई,
टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो
नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है
या कि मेरा प्यार मैला है।

अज्ञेय प्रेमिका से कहते हैं- 

यदि अब मैं तुम्हे लालिमायुक्त संध्या के आसमान का तारा नही कहता या,
शरद की सुबह की कुहरे से भीगी हुई कुमुदिनी या,
ताजी कली चम्पे की वगैरह 

तो इसका कारण यह न समझ लेना कि मेरा हृदय संवेदनहीन या सूना है, या की मेरा प्रेम सच्चा नही....

बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गये हैं।
देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

...कारण तो बस इतना सा है कि ये उपमान जूठे हो गए हैं। इनकी आभा समाप्त हो चुकी है। वैसे ही जैसे कभी-कभी बर्तन को अधिक घसने से उनपर चढ़ी कलई उतर जाती है और उनकी चमक खो जाती है।

मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी :
तुम्हारे रूप के-तुम हो, निकट हो, इसी जादु के-
निजी किसी सहज, गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूं-
अगर मैं यह कहूं-
बिछली घास हो तुम
लहलहाती हवा मे कलगी छरहरे बाजरे की?

...लेकिन क्या तुम नही पहचान लोगी की तुम्हारे इस रूप के जादू से उपजे किसी सहज, गहरे बोध से और कितने प्यार से मैं कह रहा हूँ, 

अगर मैं कहूँ की
तुम बिछी हुई घास या
हवा में लहराती हुई छरहरे बाजरे की कलगी जैसी हो?

आज हम शहरातियों को
पालतु मालंच पर संवरी जुहि के फ़ूल से
सृष्टि के विस्तार का- ऐश्वर्य का- औदार्य का-
कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है,
या शरद की सांझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी
अकेली
बाजरे की।

...आज हम शहरी लोगों के लिए इस सृष्टि के विस्तार, ऐश्वर्य और औदार्य की अनुभूति करने के लिए
पालतु मालंच अर्थात कृत्रिम मंचों (गमलों आदि) पर सुंदरता से उगी हुई जुहि के फूल से कहीं ज्यादा वास्तविक और प्यारा एक प्रतीक बिछली घांस या,
शरद की संध्या के सुने आकाश के नीचे लहराती अकेले बाजरे की कलगी है।

और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूं
यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट आता है-
और मैं एकान्त होता हूं समर्पित

...इन्हें जब भी देखता हूँ सच में ऐसा लगता है मानो संसार मे व्याप्त यह सूनापन घनीभूत होकर सिमट जाता है और मैं इसके प्रति एकांत समर्पित हो जाता हूँ।

शब्द जादु हैं-
मगर क्या समर्पण कुछ नहीं है?

...शब्दों का तो जादुई प्रभाव होता ही है,
किंतु यह समर्पण क्या कोई मायने रखता है?


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