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मानस प्रसंग (4)


हम रामचरितमानस को धार्मिक दृष्टि से देखने के पक्षपाती हैं इसीलिए इस महाकाव्य के उन असाधारण प्रसंगों का मूल्यांकन नही किया जाता है जो अपनी अंतर्वस्तु में लौकिक और मार्मिकता से संपृक्त हैं। जैसे, तुलसीदास जी ने वाल्मीकि रामायण से आगे बढ़कर मानस में जनक वाटिका के राम-सीता मिलन के प्रसंग का सृजन कर स्वयंवर को शक्तिपरीक्षण के स्थान पर प्रेम-विवाह के मंच के रूप में स्थापित किया। अतः मानस को केवल भक्तिकाव्य के रूप में देखे जाने से उसके बहुत सारे पक्ष गौण हो जाते हैं जो मानवीय दृष्टि से हमारे लिए प्रतिमान हैं, जिसमे एकनिष्ठ प्रेम के आदर्श हैं, अपने जीवनसाथी से बिछुड़ने की पीड़ा है, उसके लिए किसी भी सीमा को लांघ जाने का साहस है। तुलसीदासजी ने मानस रचना की प्रक्रिया में अपने काल का अतिक्रमण कर ऐसी प्रगतिशील समन्वयवादी दृष्टि को साधा जिसके कारण किसी भी विचारधारा के आलोचक उन्हें ख़ारिज करने का साहस नही कर सके।
आज के मानस प्रसंग की कड़ी में लंकाकाण्ड के पृष्ठों से उद्घाटित सीता-त्रिजटा संवाद का यह अंश भी ऐसा ही अद्भुत कोटि का प्रसंग है जिसे पहली बार पढ़कर आप भी आश्चर्यचकित हो उठेंगे। 
लंकाकाण्ड में जब राम-रावण युद्ध निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाला था वही समय अशोक वाटिका में शोकाकुल सीता के धैर्य की भी अंतिम अवस्था थी। व्याकुल सीता अपने अपने भाग्य से निराश होकर त्रिजटा से कहतीं हैं - 

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । 
बिधि बिपरीत चरित सब करई ⁠।⁠। 
मोर अभाग्य जिआवत ओही । 
जेहिं हौं हरि पद कमल बिछोही ⁠।⁠। 

श्रीरघुनाथजी के बाणों से सिर कटनेपर भी (रावण) नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत ही कर रहा है। मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्‌ के चरण-कमलों से अलग कर दिया है ⁠।⁠।⁠】

इस प्रकार सीता ने अपने हृदय की पीड़ा को उजागर करते हुए बहुत से आर्त वचन त्रिजटा से कहे। प्रत्युत्तर में त्रिजटा ने कहा—हे राजकुमारी! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा। परन्तु.....

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । 

एहि के हृदयँ बसति बैदेही ⁠।⁠। 

.....परन्तु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी (आप) बसती हैं । 

-और राम यही सोचकर रह जाते हैं कि.....

"एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है ⁠। 
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ⁠।⁠।"

इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हृदय में मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन हैं। अतः रावण के हृदय में बाण लगते ही सब भुवनों का नाश हो जायगा। 

क्या अनोखी बात कह दी त्रिजटा ने और क्या अद्भुत बिम्ब खींचा गोस्वामीजी ने! रावण के हृदय में जानकी, जानकी के हृदय में राम और राम के हृदय में चौदह भुवन। ध्यान देने योग्य है मध्यकालीन भारत के जटिल धार्मिक मान्यताओं के परिवेश में रावण जैसे खल चरित्र के हृदय में जानकी को अंकित दिखाने जैसी आधुनिकताबोध रखने वाले तुलसीदास जी को केवल एक भक्तकवि के रूप में ही स्मरण किया जाता रहा है। आज कवि शिरोमणि की रचनाओं के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है ताकि उनकी रचनाओं में छुपे हुए ऐसे अन्य गूढ़ तत्वों को प्रगट किया जा सके। 

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