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कालचक्र


जलधि समीर आकाश अनल


है कौन भला समय से प्रबल


रेत की तरह फिसलता जीवन


शिशु, किशोर, युवा, मरणासन्न


कभी दुर्लघ्य तो कभी सुखमय है


समय भी कितना रहस्यमय है


धन, यश, प्रेम, और सम्मान


सर्वस्व पाने का कर अनुमान


गिरते, संभलते, ठोकर खाते


जब हम इस संसार मे आते


कितना कुछ भर लेने की चाह में


भटक जाते मृगतृष्णा की राह में


कालचक्र की गति न टूटी


रह जाती अभिलाषाएं छुटी


जो चाहा उसको पा न सके


जो पाया उसे अपना न सके


भुला देने को उसे


जिसे कभी खोया था


क्षमा मांगने उससे जो


हमारी वजह से रोया था


समय नही देता हमे


एक कतरा उधार का


पीना ही होता है अन्ततः


विष स्वीकार का


मनुष्य अपने कंधों पर


कितने बोझ लिए जीता है


वक्त भी नही शायद


~हर जख्मों को सीता है~


सुयश मिश्रा (सजल)








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