Skip to main content

The Kashmir Files

भर्तृहरि नीतिशतकम में लिखते हैं : 
"हिरण, मछली और सज्जन को मात्र घास, पानी और शांति की आवश्यकता होती है, परन्तु फिर भी इस संसार में अकारण ही उनके शत्रु  क्रमशः शिकारी , मछुआरे तथा दुष्ट लोग होते हैं।"
कश्मीरी पंडितों को मारा नही गया बल्कि उनका शिकार किया गया। यह कोई लड़ाई नही थी बल्कि आतताइयों के द्वारा निर्दोषों पर घात लगाकर किया गया हमला था। यह उस पराजित मानसिकता के द्वारा किया गया सुनियोजित रक्तपात था जो स्वयं कुछ निर्मित नही कर सकने की कुंठा में सब कुछ मिटा कर विध्वंस करने में यकीन रखती है। 14वीं सदी में सिकंदर बुतशिकन इस मानसिकता का प्रस्थान बिंदु था और 1990 पुनरावृत्ति। 
कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है यह हम मानते आये हैं लेकिन इस आंगिक एकता का आधार क्या है, यह TKF देख कर पता चलता है। वह आधार है कश्मीर में भारतीय सभ्यता के एक नए अध्याय का सूत्रपात करने वाले कश्मीरी हिन्दू और बौद्ध, जिन्होंने कश्मीर की सांस्कृतिक लौ को अपने तेज, तप और त्याग की अग्नि से इस प्रकार प्रज्वलित किया कि वह cradle of civilization की उपाधि से सुशोभित हुआ। लेकिन फिर कश्मीर को जन्नत बनाने वाले उसी जन्नत से बेदखल कर दिए गए और उनके भीषण नरसंहार को इतिहास के थाहरहित गर्भ में दफना दिया गया। आखिर कश्मीरी पंडितों का दोष क्या था ? शायद यही की कश्मीर की पहचान उनके अस्तित्व के साथ इस घनिष्ठता के साथ जुड़ी थी जिसके बिना कश्मीर पर कोई भी चर्चा अर्थहीन, बेमानी होती। अतः कश्मीर के इतिहास को उसके निर्माता रहे कश्मीरी पंडितों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मानवता के इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया। 

इस फ़िल्म का कला के रुप में मूल्यांकन करना मुश्किल है क्योंकि यह कोई काल्पनिक कृति नही है जिसे मनोरंजन या कौतूहल के लिए बनाया गया हो। फ़िल्म का उद्देश्य काश्मीरी हिंदुओं के संहार, उत्पीड़न और पलायन की सच्चाई को दुनिया के सामने लाना है। फ़िल्म अपने उद्देश्य में अप्रतिम सफलता प्राप्त कर चुकी है। TKF सही मायनों में एक फ़िल्म नही है, यह कश्मीरी पंडितों के खून से रक्तरंजित नदियों, घाटियों और पहाड़ों में चीख रही वो आवाजें हैं जिनका गला घोंट दिया गया था। अपने घर से बिछुड़े इन जलावतनी लोगों पर मौत और बर्बरता का जो भयावह दौर गुजरा होगा वह फ़िल्म के उन दो तीन दृश्यों को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है जो सेंसर बोर्ड से किसी तरह बचे रह गए।

फ़िल्म के सभी पात्र अभिनय कौशल में निष्णात हैं। मुझे कृष्णा की भूमिका सबसे अच्छी लगी। वह अपने कश्मीरियत की पहचान को दोहरे स्तर पर  तलाश करता हुआ अत्यंत निस्सहाय और बेबस नजर आता है।  कृष्णा उस भारतीय यूथ का प्रतीक है जिसे न अपने इतिहास का पता है न अपनी जड़ों का। वह आयातित विचारधाराओं के आकर्षण में मंत्रमुग्ध है। उसके लिए उतना ही सच है जितना उनके पाठ्यक्रमों में दर्ज है। 

पुष्कर परिवार के अन्य सभी सदस्यों की त्रासद गाथा उनकी आंखों में व्याप्त सूनेपन में सिमट गई है जिसके लिए शब्द नही है। शारदा, शिवा और पुष्करनाथ इस फाइल का सबसे मार्मिक हिस्सा हैं जिसपर अकल्पनीय यातनाएं दर्ज हैं। यह परिवार उस विभत्स अध्याय के प्रधान प्रतीक हैं जिसके कुछ ही पन्ने हमारे सामने हैं आ सके हैं। सम्पूर्ण घटनाक्रम कितना भयानक रहा होगा, शायद हम कल्पना भी नही कर सकते।

चारो मित्र इस कहानी के भोगे हुए यथार्थ के साक्षी हैं जो अपनी हताशा, मजबूरी और पछतावे की लाश को ढोते हुए किसी तरह से जिंदा है। ब्रह्मदत्त इस मंडली के केंद्र हैं जो उस सच्चाई की फाइलें तैयार कर रहे है जिसे कभी सामने आने ही नही दिया गया। 

राधिका मेनन इस कहानी का दूसरा, अभिजात्य, और घिनौना पहलू है जो इस पूरी व्यवस्था को बौद्धिक समर्थन देकर यूथ का ब्रेनवाश कर उसे अपना हथियार बना कर भावी विभाजन की रूपरेखा तैयार कर रही है।

फारूक मलिक बिट्टा; मानो नफरत और हैवानियत ने  साक्षात शरीर धारण किया हो। इस किरदार ने सबसे ज्यादा संवाद अपनी आंखों से किया है जो काफिरों को मारने से ज्यादा तड़पाने की निर्मम अभिलाषा से भरी हुई हैं।

फ़िल्म में संक्षेप में कश्मीर के जितने भी ऐतिहासिक संदर्भ दिए गए हैं यदि उसका लेशमात्र भी हमारे पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया गया होता तब भी शायद संभव था कि बहुसंख्यक भारतवासी कश्मीर प्रश्न को पाकिस्तानी धृष्टता, नेहरू की हठधर्मिता और भूमि विवाद के रूप में देखने से आगे बढ़कर सनातन परंपरा और उसके वाहक और संरक्षक कश्मीरी हिंदुओं पर हुए वज्राघात के रूप में महसूस कर, उससे जुड़ पाते और उनके लिए आवाज बन पाते। लेकिन इस देश के राजनीतिक नेतृत्व ने वह हर संभव कोशिश की है जिससे इस देश का बहुसंख्यक वर्ग अपने ही इतिहास के बारे में अनभिज्ञ और उदासीन बना रहे। हमें इन ऐतिहासिक विवरणों से दूर रखा गया ताकि इस देश पर बलात आरोपित सेक्युलरिज्म पर आंच न आने सके, और उनका वोट बैंक प्रसन्न रहे। 

राजा राष्ट्रकृतं पापं  अर्थात राष्ट्र से (प्रजा से) किए गए पाप हेतु राजा उत्तरदायी होता हैं। इसलिए कश्मीरी पंडितों के साथ हुए पाप का उत्तरदायित्व उन सत्ताधारी राज्य और केंद्र सरकारों पर भी है जिन्होंने यह होने दिया जबकि वे इसे रोक सकते थे। अपनी ही जन्मभूमि से विस्थापित इन लोगों का भविष्य भी अनिश्चितता की गहराई में डूबा हुआ दिखाई देता है। आज चाहे आत्मग्लानि से, इंसानियत के नाते या राजनीतिक चालबाजी के लिए; कश्मीरी मुसलमान भी मुक्तकंठ से पंडितों की वापसी की वकालत करते हैं। वैसे भी कश्मीर का "जो ख़िताब था वो मिटा दिया, फ़क़त अब तो उजड़ा दयार है"
यह फ़िल्म कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के बाद से कश्मीर प्रश्न के प्रति आम लोगों के दृष्टिकोण में पैराडाइम शिफ्ट लाएगी। फ़िल्म ने आजादी और अधिकारों की लड़ाई के पीछे छिपे हुए Clash of Civilizations की वास्तविक सोच को उजागर कर धर्मान्ध और पाकिस्तान परास्त आतंकवादियों के असल चेहरे को बेनकाब कर दिया है। TKF के बाद उनके पुनर्स्थापना के प्रयास भी उसी उत्साह से किये जाने की आशा है जिस उत्साह से सरकार इस फ़िल्म के प्रोत्साहन के प्रति उत्साहित दिख रही है। 

Comments

Popular posts from this blog

पिता की याद में

बचपन की ज्यादातर स्मृतियों का धूमिल होना नियत है। निर्ममतापूर्वक कुछ स्मृतियाँ हमसे हाथ छुड़ा कर सदा के लिए विदा ले लेतीं हैं। मेरी माता का निधन मेरे जीवन में एक ऐसी अनिर्वचनीय घटना है जिसका ठीक-ठीक अर्थ मैं आज तक समझ नही पाया हूँ। यह त्रासदी तब घटित हुई जब मेरी आयु मात्र तीन वर्ष की थी। मुझे अपनी माता का चेहरा बिल्कुल याद नही लेकिन फिर भी अपने जीवन के ममता भरे उन तीन सालों में अर्जित एक स्मृति ऐसी है जिसे मैं आज तक नही भूल पाया हूँ- माँ की गोद का सानिध्य और मेरी उंगलियों में उलझा उनका आँचल। मेरी विडंबना यह रही कि आज तक मैं यह तक कल्पना नही कर पाया हूँ कि यदि मेरी माता जीवित रहतीं तो मैं उन्हें 'माँ' कहकर संबोधित कर रहा होता या 'मम्मी' या कुछ और? साथ ही कभी-कभी अपनी मानसिक निर्मित्ति में मैं उन विभिन्न परिस्थितियों की कल्पनाएँ करता हूँ जहां मेरी माँ मुझसे बातें कर रही होती हैं और मैं तय नही कर पाता हूँ कि माँ मुझसे कैसी बातें करतीं, और फिर एक के बाद एक परिदृश्य बदलते रहते और अचानक वास्तविक आनुभविक जगत में कोई हलचल इस मानसिक निर्मित्ति को भंग कर देती और ...
  "न दिन होता है अब न रात होती है सभी कुछ रुक गया है वो क्या मौसम का झौंका था जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है" आज बात एक ऐसी फिल्म की जो न केवल मध्यवर्गीय जीवन की पीड़ा को रेखांकित कर उसके अंतर्द्वंद्व को उघार देती है, बल्कि उसके भीतर के उस महान हृदय को भी स्पर्श करती है जो अपनी लघुता में भी त्याग को, अभाव में भी समर्पण को और असफलता में भी प्रेम को अपनी सबसे बड़ी निधि समझता हैं। "रेनकोट" एक असफल प्रेम के साथ - साथ एक निष्फल जीवन की भी घुटन भरी मार्मिक गाथा है। मनोज, जो जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर हारने के बाद अपने आत्मसम्मान की लाश को कन्धे पर लाद कर अपने पुराने मित्रों के आगे हाथ फैला कर मदद माँगने को भागलपुर से कलकत्ता के लिए निकल पड़ा है ताकि अपनी बहन की शादी के लिए पैसे जुटा सके। कलकत्ता में वह अपने हितैषी और मित्र आलोक के घर पर रुक कर अत्यंत संकोच के साथ आगे की योजना बनाता है और बाथरूम में शेव करते हुए अपने हालात पर टूटकर रो पड़ता है। इन कातर सिसकियों की आहट सुनाई देती है आलोक की पत्नी शीला को। शीला, जो सबकुछ होने के बावजूद उस एक अभाव के सूनेपन में...

अल्मा कबूतरी (मैत्रेयी पुष्पा)

अल्मा कबूतरी' मैत्रयी पुष्पा द्वारा रचित जनजातीय समाज की समस्याओं पर आधारित एक सशक्त उपन्यास है। उपन्यास बुंदेलखंड के आस-पास की कबूतरा जनजाति को आधार बना कर लिखी गई है। मैत्रयी पुष्पा ने उपन्यास में जनजातियों की बद्तर जिंदगी और सभ्य समाज द्वारा उनके प्रति संवेदनहीन दृष्टिकोण का अत्यंत यथार्थ चित्रण किया है। अपनी यथास्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट में जिंदगी बशर करने वाले ये जनजातीय समुदाय निकृष्ट जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। सभ्य समाज, जिनके द्वारा इन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है, इनकी स्त्रियों को अपनी वासना का शिकार बनाने के लिए हमेशा उत्सुक रहता है। समाज से कट कर जंगलों और बीहड़ों में जिंदगी गुजारने वाले ये समुदाय तथाकथित सभ्य समाज द्वारा स्वघोषित चोर और अपराधी हैं। उपन्यास की केंद्रीय पात्र 'अल्मा' है जो अपने पिता के द्वारा ऋण न चुकाए जाने के एवज में सूरजभान के यहां गिरवी रख दी जाती है। यहां अल्मा का न सिर्फ अनेक प्रकार से शारिरिक और मानसिक शोषण होता है, बल्कि उसे देह व्यापार में भी शामिल कर दिया जाता । अनेक प्रकार की यातनाओं से गुजरती हुई अल्मा जब मंत्री...