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दुर्वाचल (अज्ञेय)

आइये आज एक यायावर की आँखों से प्रकृति को देखते हैं। अज्ञेय अपनी प्रयोगशीलता के लिये सुविख्यात हैं। वे जितना महत्व भाषा को देते हैं उतना ही महत्व शब्दों की मितव्ययिता को भी देते हैं। उनका मानना है कि रचना में एक भी शब्द व्यर्थ में शामिल न हो। कम शब्दों में भी बड़ा अर्थ भरने की विशेषता उन्हें आधुनिक कवि और उससे भी ज्यादा सजग कवि के रूप में स्थापित करती है। उनकी इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए हम उनकी कविता 'दुर्वाचल' का विश्लेषण करेंगें। हमारा यात्री (अज्ञेय) एक ऐसे पर्वतीय स्थल पर है जिस गिरि का पार्श्व नम्र है, कोमल है। कोमलता का पर्वतों के साथ संयोग अज्ञेय जैसा सजग यात्री ही कर सकता है। यहाँ चीड़ के वृक्षों की ऊपर जाती पंक्ति ऐसी लग रही है मानो उमंगें डगर चढ़ रही हो। नीचे की ओर बिछी नदी (बहती नही) अर्थात एक ठहराव है और यह ठहराव गतिहीनता की सूचक नही बल्कि एक शांति का प्रतीक है।  और फिर अद्भुत बिम्ब का प्रयोग - नदी ऐसी लग रही है मानो एक 'दर्द की रेखा' खिंची हो, जैसे दर्द ने मूर्त रूप धारण कर लिया हो। इसे कहते हैं थोड़े से शब्दों में बड़ा अर्थ भरना। ...

मानस प्रसंग (1)

सुनत श्रवन बारिधि बंधाना।  दस मुख बोलि उठा अकुलाना।⁠। बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस । सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ।⁠। रावण का पूरा स्टेटस डर की बुनियाद पर खड़ा था। जब रावण को मन्दोदरी ने समझाया कि सीता को वापस भेज कर अपने प्राण बचवा लो तब बड़े अभिमान के साथ रावण कहता है "जिनके प्राण बेचारे समुद्र के बीच में आ जाने की वजह से मुझसे बचे हुए हैं, उनसे मेरी स्त्री भय खा रही है, बड़ी हँसी की बात है।"  कुछ लोग इसी तरह के फेक कॉन्फिडेंस से माहौल बना के रखते हैं भले ही अंदर से दिल मारे डर के कांप रहा हो। रावण का आत्मविश्वास कितना नकली था यह इस बात से पता चल जाता है जब उसी बेचारे समुद्र पर सेतु का बाँधा जाना कानों से सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखोंसे बोल उठा------ वननिधि, नीरनिधि,  जलधि,  सिंधु,  वारीश,  तोयनिधि,  कंपति,  उदधि,  पयोधि,  नदीश को क्या सचमुच ही बाँध लिया? पूरे रामचरितमानस में रावण के मुख से निकले कौतुक भरे ये शब्द अलग ही लेवल के हैं। डर का आलम यह है कि दसों मुखों से ...

लौट चलो

सुनो अवनी की उन  कातर चीत्कारों को, जो मांग रही हमसे क्षमा अपने नैसर्गिक प्रेम को बांटने के अपराध में। सुनो विलाप करती हुई उस धरती का लोमहर्षक रुदन, जो दे रही हमे चेतावनी। मनुष्य! रोक दो अपनी क्षुधातुर एषणा के रथ को अन्यथा सूख जाएंगे सरिता के स्त्रोत और बुझ जाएगी प्यास  सदा के लिए। मिट जाएगा हवा और  जहर का भेद। फूल से कुम्हला जाएंगे  बच्चों के फेफड़ें। जीवन गर्भ में आते ही  दम तोड़ देगा। मर जाएंगे पर्वत,  सड़ जाएगा समुद्र और मिटा देगा दावानल  जंगलों को सदा के लिए। मढ़ा जाएगा असंख्य जीवहत्या  का पाप तुम्हारे सर और  मुक्त नही होगा मनुष्य इस  महापातक से कल्पों तक। पिघला दो सभी गाड़ियों का लोहा और भर दो ज्वालामुखी की दरारों में। इकट्ठा करके प्लास्टिक के पहाड़ चुनवा दो उसे पत्थर की दीवार से। झोंक दो वे सारे उपकरण, जो तुम्हें देते हैं आनंद  सुलगती हुई धरती की कीमत पर। बंद कर दो फैक्ट्रीयां ...

पूर्णेन्दु के जन्मदिवस पर

राजनगर की तबाही से राग दरबारी तक। बीएससी साइकल से  सरकारी गाड़ी तक।। एरिटोप जेल से  पतंजलि एलोवेरा तक। अंतहीन बातों में गुजरे रात से सवेरा तक।। बिन बुलाई शादियों में घुस कर दावत खाने तक। जोड़-जोड़ कर चार पैसे कॉण्ट्रा खेलने जाने तक।। ग्राफिक्स वर्ल्ड के स्लो इंटरनेट में लोड होते पेज तक। बेफिक्री वाले बचपने से संघर्षों वाले ऐज तक।। हँसी के ठहाकों में दबी  बेचैनी की आहों तक। चिंता के बादल में डूबी नम होती निगाहों तक।।   गिरते-संभलते ठोकर खाते मंजिल को पाने तक। बीते हुए कल से लेकर आने वाले जमाने तक।। ~ जन्मदिन मुबारक रहेगा ~

जब प्रेमचंद को संबोधित किया गुलज़ार ने

जानेमाने लेखक, कवि और फ़िल्मकार गुलज़ार ने प्रेमचंद को कुछ इन शब्दों में संबोधित किया है. 'प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है... मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी ‘होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक पोर पोर दिखलाते रहे हो किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही ‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती अपने और पराए भी ख़ाली गोद रही आख़िर कहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या ‘हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में ‘घीसू’ ने भी कूज़ा कूज़ा उम्र की सारी बोतल पी ली तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफ़न जलने में क्या है ‘एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते सांस की गिनती छूट गई है तीन तीन पुश्त...

कर्मभूमि (मुंशी प्रेमचंद)

प्रेमचंद भारतीय जनमानस के सूत्रों को व्याख्यायित करने वाले लेखक है। 'कर्मभूमि' उनके द्वारा लिखा गया एक राजनीतिक उपन्यास है जिसका प्रकाशन वर्ष 1932 में हुआ। इस दौर में देश महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था। कथानक बनारस और हरिद्वार के इर्द-गिर्द के इलाकों के परिवेश में बुना गया है। कर्मभूमी के विभिन्न पात्र अलग-अलग वर्गों एवं मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। अमरकांत और उसकी पत्नी सुखदा देश और समाज के प्रति संवेदनशील है। अमरकांत एक दृढ़ समाज सेवक है जो गांधीवादी रास्ते पर चल कर अपने सामाजिक दायित्व को पूरा करने का प्रयास करता है। 'लाला समरकान्त' कुटिल साहूकार है और पैसों के पीछे जान छिड़कते हैं। 'गूदड़' निम्न जाति का किसान है जो सामन्तवादी शोषण का शिकार होता है। इस प्रकार विविधता से भरे अनेक पात्र इस उपन्यास में जगह-जगह आकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते है। इसके अलावा अमरकांत और मुस्लिम लड़की सकीना में प्लेटोनिक प्रेम का भी प्रसंग है लेकिन प्रेमचंद ने उसे ज्यादा बढ़ने नहीं दिया है। प्रेमचंद ने इस उपन्यास में कई तरह की युगीन समस...

कायाकल्प (मुंशी प्रेमचंद)

कायाकल्प' मुंशी प्रेमचंद का एक प्रसिद्ध उपन्यास है। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने मुख्य रूप से साम्प्रदायिकता की समस्या को उठाया है। उपन्यास में दोनों धर्मों के कुछ अवसरवादी तत्वों के द्वारा दंगो की आड़ में अपने स्वार्थ को साधने का यथार्थ चित्रण किया गया है। इस कहानी का मुख्य पात्र 'चक्रधर' है जिसमें समाजसेवा की प्रबल भावना है। चक्रधर जमींदार की पुत्री मनोरमा से प्रेम करता है लेकिन उनका विवाह नही हो पता है। बाद में वह सारी परम्पराओं को ठुकराकर एक मुस्लिम परिवार की विधवा से शादी करता है। उपन्यास के कथानक के समानांतर एक पुनर्जन्म की कहानी भी चल रही है। जगदीशपुर की विलासप्रिय रानी देवप्रिया को जब अपने पूर्वजन्म का पति मिल जाता है तब वह अपनी जागीर विशाल सिंह को सौंप कर चली जाती है। प्रेमचंद ने कायाकल्प में अलौकिकता का सृजन कर उसे सामयिक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया है। उपन्यास में जागीरदारों द्वारा चमारों के शोषण, कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार और अंग्रेजी हुकूमत के हिंसक स्वरूप का वर्णन किया गया है। मूल संवेदना में चक्रधर का जीवन संघर्ष है जो पाठकों को प्रभावित ...